जांजगीर-चांपा अग्रदूत | जिले सहित सक्ती के ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों ने सोमवार को एकजुट होकर पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर अवैध वसूली, धमकी और सूचना के अधिकार अधिनियम के कथित दुरुपयोग के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। सरपंच एवं सचिव संघ के पदाधिकारियों ने लिखित ज्ञापन सौंपते हुए कहा कि पंचायत स्तर पर काम कर रहे जनप्रतिनिधियों को व्यवस्थित तरीके से मानसिक दबाव में लिया जा रहा है।
ज्ञापन विजय कुमार पांडेय (पुलिस अधीक्षक, जांजगीर-चांपा) को सौंपा गया।
30–40 RTI आवेदन, 5–10 साल के अभिलेख की मांग से बढ़ा मानसिक दबाव
सचिव संघ के जिला अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह गहलोत ने बताया कि हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी जांजगीर निवासी निलेश कुमार साहू सहित कई व्यक्तियों द्वारा स्वयं को पत्रकार बताते हुए पंचायत प्रतिनिधियों पर धनराशि देने का दबाव बनाया जा रहा है।
आरोप है कि:
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प्रत्येक छह माह में समाचार पत्र में विज्ञापन प्रकाशित करने के नाम पर बड़ी रकम मांगी जाती है।
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राशि न देने पर सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत 30–40 आवेदन एक साथ भेजे जाते हैं।
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आवेदनों में 5–10 वर्षों के विस्तृत अभिलेख मांगे जाते हैं।
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आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने और जेल भेजने की धमकियां दी जाती हैं।
पंचायत पदाधिकारियों का कहना है कि एक ही प्रकार के भारी-भरकम और पुनरावृत्तिपूर्ण आवेदन से शासकीय कामकाज प्रभावित हो रहा है। रिकॉर्ड जुटाने में पूरा अमला उलझ जाता है, जिससे विकास कार्य बाधित होते हैं और अनावश्यक मानसिक दबाव बनता है।
अवैध वसूली के साधन के रूप में समाचार पत्र का उपयोग?
ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया गया है कि संबंधित व्यक्ति स्वयं को “छत्तीसगढ़ साथी” नामक समाचार पत्र का चीफ एडिटर बताता है और कथित पत्रकारिता की आड़ में पंचायतों पर दबाव बनाता है।
सरपंचों और सचिवों का कहना है:
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संबंधित समाचार पत्र का जिले में कोई मुद्रण कार्यालय नहीं है।
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किसी शासकीय कार्यालय या आम नागरिक को नियमित प्रति उपलब्ध नहीं कराई जाती।
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पत्रकारिता संबंधी वैध मान्यता या पंजीयन के प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
प्रथम दृष्टया पंचायत प्रतिनिधियों का आरोप है कि समाचार पत्र का उपयोग केवल अवैध वसूली के साधन के रूप में किया जा रहा है।
पारदर्शिता बनाम भयादोहन
उन्होंने पुलिस प्रशासन से मांग की है कि:
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अवैध वसूली के प्रयासों की निष्पक्ष जांच हो।
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धमकी देने वालों के खिलाफ विधिसम्मत कार्रवाई की जाए।
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पंचायतों के शासकीय कार्य में बाधा डालने वालों पर कानूनी कार्रवाई हो।
अब निगाहें पुलिस प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला सिर्फ एक जिले का नहीं, बल्कि ग्रामीण प्रशासन पर पड़ रहे बढ़ते दबाव का संकेत माना जाएगा।
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